Kattaha Brahmin

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The Mahabrahmin / Kattaha Brahmin / Acharya are a Hindu caste found in the state of Uttar Pradesh, Panjab, Hariyana, Rajasthan, Uttarakhand, Madhya Pradesh and Bihar in India.[1]

Social organization[edit]

-आचार्य, गुरु, पण्डित, विद्वान, महाब्राह्मण, कट्टाह ब्राह्मण, अचारज।

-मृत्युोपरांत मोक्ष प्राप्ति हेतु ग्यारहवें की क्रिया-कर्म हवन-यज्ञ तथा पिण्डदान कराने वाली एक विशेष ब्राह्मण जाति या इस जाति का व्यक्ति ।

-इनको महा-ब्राह्मण या आचारज भी कहते हैं । ये अपनी परंपरा गर्ग ऋषि से लगाते हैं और बयान करते हैं कि जब राजा दशरथजी की मृत्यु हुई थी तो उनके आत्मा के मोक्ष के लिए ग्यारहवें दिन की क्रिया-कर्म व यज्ञ-हवन गर्ग ऋषि ने कराया और 5 ग्रास खीर, रोटी और चावल वगैरा के खाये थे। इस प्रकार पहली बार ऐसा संभव होने पर अन्य ऋषियों को आश्चर्य(अचरज) हुआ। उस दिन से उनका नाम ‘आचारज’ हुआ और मृत्यु उपरांत ग्यारहवें की क्रिया-कर्म और यज्ञ-हवन कराने और 5 ग्रास ग्यारहवें दिन खाने की रीति उनके वंश में जारी हो गई। इस प्रकार आत्मा के मोक्ष प्राप्ति हेतु किये गये कर्म को महान कर्मों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हुआ और महान ऋषि-मुनियों एवम् भगवान राम से यह आशीर्वाद प्राप्त हुआ कि इस वंश के ब्राह्मणों द्वारा किये गए विधिवत यज्ञ-हवन, क्रिया कर्म तथा पिण्डदान से किसी भी आत्मा की शांति एवं मोक्ष प्राप्ति संभव होगी। इस प्रकार महान कर्मों के ज्ञाता होने तथा आत्मा के मोक्ष प्राप्ति के श्रेष्ठ कर्म को करने वाले ब्राह्मणों में महान एवं श्रेष्ठ कहलाये और इस वंश के ब्राह्मणों को महाब्राह्मण की उपाधि प्राप्त हुईं।

यह सब सरयू नदी के तट से विस्थापित हुए। इस वंश को बढ़ाने और सम्पूर्ण मानव जाति के उद्धार हेतु राजा दशरथ की क्रिया के पश्चात् हर ब्राह्मण गोत्र से एक दम्पति मिलाकर इस ब्राह्मण जाति का गठन किया गया तथा ऋषि गर्ग से उस मोक्ष प्राप्ति हेतु ग्यारहवें की क्रिया-कर्म, यज्ञ-हवन तथा पिण्डदान करने की विधि की दीक्षा एवं ज्ञान प्राप्त किया। [2]

Present circumstances[edit]

-आचार्य, गुरु, पण्डित, विद्वान, महाब्राह्मण।

-कालांतर में यह जाति उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखण्ड एवं बिहार में निवास करती हैं। इसमें कई गोत्र हो गये हैं । इनकी अब कई खांपें पाई जाती हैं- 1. शांडिल्य, 2. कश्यप, 3. भारद्वाज, 4. सिनावड़, 5. बांवलिया, 6. बागड़ी, 7. डलीवाल, 8. सारस्वत, 9. मामाणिया, 10. जोशी, 11. दायमा, 12. रावखड़, 13. पीपलोदिया, 14. आलावत, वगैरा ।

ये शिव धर्म को मानते हैं और महादेवजी को पूजते हैं। इनमें दारू मांस से ये परहेज करते हैं । परंतु कालांतर में यह जाति अधिक पिछङ गईं, अशिक्षा एवं गरीबी से त्रस्त इस वंश के ब्राह्मण अपने कर्म ज्ञान से विमुख हो गये, और अपना ज्ञानवर्धन की जगह मृत्युोपरांत अधिक दान प्राप्ति के लालच में अपने कर्म से गिर कर अपने वंश की मर्यादा भूल गए और कुछ निर्लज्ज लोग अशुद्ध दान ग्रहण करने लगे। तथा अपने मूल कर्म से गिर गये। इस प्रकार गिरे हुए कृत्यों तथा अशुद्ध दान से अन्य ब्राह्मणों ने इनका साथ छोड़ कर इन्हें निम्न स्तर के ब्राह्मण जैसा व्यवहार कर पिछङा बना दिया। कालांतर में यह जाति अपना यश,कीर्ति एवं ख्याति खोकर तथा अपनी वैदिक धर्म एवं कर्म से विमुख अंधकारमय जीवन जी रही हैं।

परंतु पिछले दो दशकों में यह जाति अपने कर्म से ऊपर उठकर शिक्षा की ओर अग्रसर हुईं हैं। अच्छी शिक्षा और जीवन स्तर में आधुनिक एवं अभूतपूर्व परिवर्तन से यह जाति अपना यश एवं कीर्ति पुनः प्राप्ति की ओर अग्रसर है। अच्छे संस्कार और संस्कृति को अपनाकर ज्ञानवर्धन के माध्यम से अपनी धूमिल छवि को अच्छी करने में जुटे हुए हैं। दान दक्षिणा का त्याग कर स्वरोजगार करके अपने जीवन को मधुर एवं सम्मानित बना रहे हैं।

References[edit]

  1. ^ People of India Uttar Pradesh Volume XLII Part Two edited by A Hasan & J C Das pages 758 to 762 Manohar Publications
  2. ^ People of India Uttar Pradesh Volume XLII Part Two edited by A Hasan & J C Das pages 758 to 762 Manohar Publications