Shri Ramachandra Kripalu

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"Shriramachandra Kripalu" is a prayer written by Goswami Tulsidas. It was written in the sixteenth century, in the Sanskrit language. The prayer glorifies Hindu deity Rāma and his characteristics.[1]

In Sanskrit/Hindi:

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजमन हरणभवभयदारुणं । नवकञ्जलोचन कञ्जमुख करकञ्ज पदकञ्जारुणं ॥१॥

व्याख्या: हे मन कृपालु श्रीरामचन्द्रजी का भजन कर । वे संसार के जन्म-मरण रूपी दारुण भय को दूर करने वाले हैं । उनके नेत्र नव-विकसित कमल के समान हैं । मुख-हाथ और चरण भी लालकमल के सदृश हैं ॥१॥

कन्दर्प अगणित अमित छवि नवनीलनीरदसुन्दरं । पटपीतमानहु तडित रूचिशुचि नौमिजनकसुतावरं ॥२॥

व्याख्या: उनके सौन्दर्य की छ्टा अगणित कामदेवों से बढ़कर है । उनके शरीर का नवीन नील-सजल मेघ के जैसा सुन्दर वर्ण है । पीताम्बर मेघरूप शरीर मानो बिजली के समान चमक रहा है । ऐसे पावनरूप जानकीपति श्रीरामजी को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥

भजदीनबन्धु दिनेश दानवदैत्यवंशनिकन्दनं । रघुनन्द आनन्दकन्द कोशलचन्द्र दशरथनन्दनं ॥३॥

व्याख्या: हे मन दीनों के बन्धु, सूर्य के समान तेजस्वी, दानव और दैत्यों के वंश का समूल नाश करने वाले, आनन्दकन्द कोशल-देशरूपी आकाश में निर्मल चन्द्रमा के समान दशरथनन्दन श्रीराम का भजन कर ॥३॥

शिरमुकुटकुण्डल तिलकचारू उदारुअङ्गविभूषणं । आजानुभुज शरचापधर सङ्ग्रामजितखरदूषणं ॥४॥

व्याख्या: जिनके मस्तक पर रत्नजड़ित मुकुट, कानों में कुण्डल भाल पर तिलक, और प्रत्येक अंग मे सुन्दर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं । जिनकी भुजाएँ घुटनों तक लम्बी हैं । जो धनुष-बाण लिये हुए हैं, जिन्होनें संग्राम में खर-दूषण को जीत लिया है ॥४॥

इति वदति तुलसीदास शङकरशेषमुनिमनरञ्जनं । ममहृदयकञ्जनिवासकुरु कामादिखलदलगञजनं ॥५॥

व्याख्या: जो शिव, शेष और मुनियों के मन को प्रसन्न करने वाले और काम, क्रोध, लोभादि शत्रुओं का नाश करने वाले हैं, तुलसीदास प्रार्थना करते हैं कि वे श्रीरघुनाथजी मेरे हृदय कमल में सदा निवास करें ॥५॥

मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर सावरो । करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥६॥

व्याख्या: जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से सुन्दर साँवला वर (श्रीरामन्द्रजी) तुमको मिलेगा। वह जो दया का खजाना और सुजान (सर्वज्ञ) है, तुम्हारे शील और स्नेह को जानता है ॥६॥

एही भाँति गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषीं अली । तुलसी भवानी पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥

व्याख्या: इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत सभी सखियाँ हृदय मे हर्षित हुईं। तुलसीदासजी कहते हैं, भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चलीं ॥७॥

जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मञ्जुल मङ्गल मूल बाम अङ्ग फरकन लगे ॥८॥

व्याख्या: गौरीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के हृदय में जो हर्ष हुआ वह कहा नही जा सकता। सुन्दर मंगलों के मूल उनके बाँये अंग फड़कने लगे ॥८॥

गोस्वामी तुलसीदास

Lyrics[edit]

संस्कृते

॥ श्रीरामचन्द्र कृपालु ॥

श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणं ।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥
कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं । ॥७
पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि नोमि जनक सुतावरं ॥२॥
भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं ।
रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥
शिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं ।
आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥
इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं ।
मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं ॥५॥
मन जाहि राच्यो मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो ।
करुणा निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो ॥६॥
एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषित अली ।
तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥

सो० - जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि ।

     मंजुल मंगल मूल वाम अङ्ग फरकन लगे ॥
गोस्वामी तुलसीदासः
English Transliteration:

॥ Shriramachandra Kripalu॥

Śrīrāmacandra kr̥pālu bhajamana haraṇabhavabhayadāruṇaṁ.
Navakañjalocana kañjamukha karakañja padakañjāruṇaṁ. ।।1।।
Kandarpa agaṇita amita chavi navanīlanīradasundaraṁ.
Paṭapītamānahu taḍita ruciśuci naumijanakasutāvaraṁ. ।।2।।
Bhajadīnabandhu dinēśa dānavadaityavaṁśanikandanaṁ.
Raghunanda ānandakanda kośalacandra daśarathanandanaṁ. ।।3।।
Śiramukuṭakuṇḍala tilakacāru udāru'aṅgavibhūṣaṇaṁ.
Ājānubhuja śaracāpadhara saṅgrāmajitakharadūṣaṇaṁ. ।।4।।
Iti vadati tulasīdāsa śaṅkaraśeṣamunimanarañjanaṁ.
Mamahr̥dayakañjanivāsakuru kāmādikhaladalagañajanaṁ. ।।5।।
Gosvāmī Tulasīdāsa

Meaning of the song in English

O mind! Revere the benign Shri Ramachandra, who removes 'Bhava' the worldly sorrow or pain, 'Bhaya' the fear, and 'Daruna' the scarcity or poverty.
Who has fresh lotus eyes, lotus face and lotus hands, feet like lotus and like the rising sun. ॥1॥
His image exceeds myriad Kamadevas, like a fresh, blue-hued cloud — magnificent.
His amber-robes appear like lightning, pure, captivating. Revere this groom of Janaka’s daughter. ॥2॥
Sing hymns of the brother of destitutes, Lord of the daylight, the destroyer of the clan of Danu-Diti demons.
The progeny of Raghu, limitless 'joy', the moon to Koshala, sing hymns of Dasharatha’s son. ॥3॥
His head bears the crown, ear pendants, tilaka on forehead, his adorned, shapely limbs are resplendent.
Arms extend to the knees, studded with bows-arrows, who won battles against Khara and Dushana. ॥4॥
Thus says Tulsidas, O joy of Shankara, Shesha and other Sages.
Reside in the lotus of my heart, O slayer of the vices-troops of Kama and the likes. ॥5॥
Goswami Tulsidas

References[edit]